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क्यों भारत में सोशल डिस्टेन्सिंग हुई कारगर

हाल ही में छपे कई लेखों में ऐसा कहा गया कि कोरोना से बचने के एकमात्र उपाय ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ का सफलतापूर्वक पालन करना अत्याधिक जनसंख्या वाले भारत के बस की बात नहीं| एक जानी मानी वेबसाइट ने तो यह भी लिख दिया की ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ सिर्फ मध्य वर्ग का विशेषाधिकार है और भारतवासियों के लिए ये शारीरिक और आर्थिक रूप से बिल्कुल असंभव है। जबकि अगर आंकड़ों पर नज़र डाली जाएं तो भारत बाकी देशों की तुलना में काफी सफल रहा है । दुनिया में कोरोना वायरस बहुत तेजी से बढ़ रहा है और जब तक कोई प्रभावी दवा या टीका कामयाब नहीं होता तब तक प्रभावी ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ ही इसको रोक सकने में सफल हो सकती है ।

क्या है ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’

हिन्दी में इसका शाब्दिक अर्थ है ‘सामाजिक दूरी’ | स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ संक्रामक बीमारियों को रोकने की एक अचिकित्सकीय विधि है जिसका मकसद संक्रमित और असंक्रमित लोगों के बीच संपर्क को रोकना या कम करना है ताकि बीमारी को फैलने से रोका जाए या संक्रमण की रफ्तार को कम किया जा सके| सोशल डिस्टेंसिंग से बीमारी के फैलने और उससे होने वाली मौतों को रोकने में मदद मिलती है|

सामाजिक व्यवहार में कोई बदलाव नहीं होने से, एक संक्रमित व्यक्ति औसतन पांच दिनों के भीतर 2.5 लोगों को वायरस पास करेगा। 30 दिनों के बाद, यह आंकड़ा विनाशकारी 406 नए संक्रमणों की ओर बढ़ जाएगा। कम सामाजिक संपर्क से संख्या को काफी कम किया जा सकता है। 50 प्रतिशत की कमी के साथ, 30 दिनों के बाद औसत व्यक्ति द्वारा होने वाले नए संक्रमणों की संख्या सिर्फ 15 लोग होगी। 75 प्रतिशत बदलाव के परिणामस्वरूप 2.5% नए मामले सामने आएंगे – स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ को कम करने के लिए ये बहुत ज़रूरी है|

यह देखा गया कि कोरोना वायरस का संक्रमण तीव्र गति से अमेरिका और यूरोप के देशों में फैला है । अब तक दुनिया में 25 लाख से ज्यादा लोग कोरोना संक्रमित हो गए है तथा मौत का आंकड़ा भी डेढ़ लाख के पार हो चुका है । भारत में अपेक्षाक्रत आंकड़ा कम है । यह वायरस किसी को नहीं छोडता चाहे कोई अमीर हो या गरीब हो, किसी भी समुदाय का हो, कितने भी बड़े पद पर हो या दुनिया के किसी भी हिस्से में रहता हो लेकिन यह अमेरिका और यूरोप के देशों में इतनी तेजी से क्यों फैला ? यह एक विचारणीय प्रश्न है ।

जान है तो जहान है

जहाँ कुछ देशों के नेताओं के लिए कोरोना से आयी आर्थिक मंदी एक प्राथमिक विषय है वही भारत जैसे आत्मनिर्भर देश के लिए अपने लोगों की जान की रक्षा करना ही प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री मोदी देश के हर नागरिक के बारे में चिंतित हैं और समय रहते सही जानकारियां देशवासियों से सांझा करते रहते हैं । भारत दूसरे लॉकडाउन में प्रवेश कर चूका है जो ३ मई तक लागू रहेगा । आर्थिक मंदी पर प्रधानमंत्री मोदी एक ही जवाब है – जान है तो जहान है । उनका कहना है की कोरोना के पश्चात् देश का युवा फिर से अर्थव्यवस्था को आगे ले जायेगा ।

एकता में है शक्ति

इस गंभीर समय में देश जैसे एक जुट होकर सामने आया है । हर कोई अपने तरीके से योगदान दे रहा है – कोई अपनी रचनाओं से देश का मनोबल बड़ा रहे हैं, कोई दान दे रहे है , कोई खान-पान का ध्यान रखे हुए है , कोई मास्क बना रहा है और भी न जाने क्या क्या…ये समझदारो के समझने की ही बात है की १३० करोड़ होना हमारी कमजोरी नहीं बल्कि हमारी शक्ति है|

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा की लोगों के लिए हमारा सेवा-भाव, वसुधैव कुटुम्बकम् का संस्कार, सदियों पुरानी जीवन-शैली और नमस्कार जैसे शिष्टाचार ही मिलकर ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ को कारगर बना रहे हैं वरना अकेला ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ भी क्या कर लेता |

 

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