Hindi

क्या महत्व है मंदिरों में भोजन की परंपरा का

शास्त्रों के अनुसार अगर सबसे बड़ा दान कोई है तो वो अन्न दान है। इसीलिए कहा गया है कि अगर कुछ दान करना ही है तो अन्नदान करो। अन्नदान करने से बहुत लाभ होता है। मान्यता है आपकी कमाई का 10% अन्नदान, दान, मंदिर और पूजा के लिए खर्च किया जाना चाहिए। भारत में अधिकांश मंदिर लाखों लोगों को प्रतिदिन अन्नदान देते हैं और कई मंदिर विशेष अवसरों या त्योहारों पर इसकी सेवा करते हैं।

भारत के प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालुओं को भोजन कराने के परंपरा रही है I भोजन सदैव शाकाहारी ही हुआ करता है I और समूहिक ही हुआ करता था I जिसकी व्यवस्था के लिए मंदिर प्रशासन जी जान से जुटा रहता है I यहाँ यह भी भावना प्रबल रहती थी कि भक्तगण बाहर से आते हैं उनके लिए भोजन तो मिलना ही चाहिए I हम इस लेख में कुछ मंदिरो में भोजन कराने की व्यवस्था का वर्णन करेंगे I 

जगन्नाथ मंदिर की चावल पकाने की अनोखी विधि

चावल पकाने की अनोखी विधि भारत के उड़ीसा के तटीय शहर पुरी में भगवान जगन्नाथ का मंदिर है I पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है I मंदिर में 25000 से 30000 भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं I त्योहार के दौरान संख्या लाख से भी ऊपर हो जाती है I यहाँ चावल पकाने का अनोखा तरीका अपनाया जाता है I मिट्टी के सात बर्तनों में चावल और पानी रखकर उन्हे चूल्हे के ऊपर एक क्रम से रखते हैं I सबसे नीचे वाले बर्तन का चावल सबसे आखिर में और सबसे ऊपर वाले बर्तन का चावल सबसे पहले पकता है I यह सारी व्यवस्था भक्तों के दान से होती है I 

 तिरुपति बालाजी में अन्नदान

भारत के आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति बालाजी मंदिर है I यह विश्व के सबसे सम्पन्न मंदिरों में एक है I यहाँ रोजाना 60-70 हजार श्रद्धालु आते हैं और लाखों रूपये का चढ़ावा चढ़ाते हैं I मंदिर में रोजाना 300 साल पुरानी पारंपरिक विधि से 3 लाख लड्डू बनाये जाते हैं I मंदिर की ओर से भक्तों को अन्नदानम के तहत रोजाना चावल, साँभर, रसम, चटनी आदि निशुल्क मिलती है I अन्नदानम में दान करने वाले भक्त मानते हैं कि ईश भक्ति का सबसे निश्छल भाव है – बगैर किसी अपेक्षा के भूखे को भोजन कराना I 

स्वर्णमंदिर में गुरु की असीम कृपा मिलती है

सिखों के पांचवे गुरु श्री अर्जुनदेव ने 16वीं सदी में हरमंदिर साहब की स्थापना की थी I स्वर्णमंदिर में रोज हजारों श्रद्धालु दरबार साहिब में मत्था टेकने आते हैं I इसके पश्चात लंगर भवन में एक कतार में भोजन करते हैं I यहाँ रोजाना औसतन एक लाख लोगों के लिए भोजन तैयार होता है I भोजनकक्ष के द्वार पर ही साफ धुली थालियाँ, चम्मच, कटोरे रखे रहते हैं I श्रद्धालु आवश्यकतानुसार बर्तनों को लेकर गलीचे पर बैठ जाते हैं I एक-एक करके सेवादार सधे हाथों से रोटी, दाल, सब्जी, खीर आदि परोसते हैं I आप पेट भर कर खा सकते हैं I खाना परोसने से लेकर झूठे बर्तनों को धोने और कक्ष की सफाई तक का काम आपसी सहयोग से पूरा होता है जिसमें श्रद्धालु खुशी से अपना योगदान देते हैं और उसे कारसेवा कहते हैं I

वैकल्पिक ऊर्जा से संचालित रसोई 

दक्षिण कर्नाटक स्थित श्रीक्षेत्र धर्मस्थल मंजूनाथ स्वामी मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगती है I कहा जाता है कि यह 800 साल पुराना शिव मंदिर है I यहाँ अन्न दान की पुरानी परंपरा है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि मंदिर में हर भक्त को प्रसाद रूप में पूर्ण भोजन मिले I यहाँ भोजन किए बिना किसी का दर्शन पूरा नहीं होता I पुराने भोजनकक्ष और रसोई अपर्याप्त हो गए थे I अत: 1986 में डा॰ हेगड़े ने आधुनिक भोजनकक्ष “अन्नपूर्णा” का शुभारंभ किया I यह आधुनिक वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है I यहाँ 30000 से 70000 तीर्थयात्रियों को भोजन कराने की स्वच्छ और स्वचालित रसोई है I “अन्नपूर्णा” को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए मंदिर प्रबंधन रसोई को वैकल्पिक ऊर्जा से संचालित करता है I

उक्त से स्पष्ट होता है कि भारत के मंदिरों में भोजन कराने की परंपरा कितनी समरद्ध रही है और आज भी है I  

 

Leave a Reply